इंटरव्यू लेने वाले ने पूछा : तुम्हारा नाम क्या है?
हरियाणवी : विजय दीनानाथ चौहान।
इंटरव्यू लेने वाला : लेकिन फॉर्म में तो
तुमने अपना नाम रामफल लिखा है?
हरियाणवी: फेर क्यों सुआद ले है?

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रुट्ठी बैठी … न्यू कवै तन्नै आज फेर पी ली … तेरी लाइफ मैं मेरी जगाह के है … पुराणी सिम बरगी … जब जी करया घाल दी , जब जी करया लिकाड़ दी … 😏

तो आ जा नैं लाइफ टाइम रिचार्ज बणकै … जिंदगी भर दूसरी सिम की सोचूं भी कोनी

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दिल्ली मैं कुछ पटाखा समर्थक स्वंयसेवक संघों नै सुप्रीम कोर्ट की रोक का एक तोड़ काड्या है …
उन्होनै फैसला करया है अक दिवाली के दिन सारे दिल्ली ऐन सी आर आल्यां तै पेट भर कै मूली के परांठे तीन तीन गलास लास्सी अर चार चार हाजमोला की गोली फरी दी जावैगी …
आजो कोर्ट साब रोक ल्यो धमाके अर कर ल्यो पोल्युशन कंट्रोल …

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पूनम : कोई आवाज दे है बाहर गेट पै , देखियो ।
अनिल : कौण है ?
पूनम : मैं ना पिछाणती
अनिल : अच्छा , रुकण की कह , मैं आऊं हुँ बाहर नै ।
एक तै इस घर मैं कुछ मिलता नी बख्त पै , मेरी घड़ी कित गई इब ?
किसे काम की नहीं या लुगाई , कोय चीज ठिकाणे पै नी पाती , बेरा ना के करती रह है सारे दिन बैठ्ठी बैठ्ठी ।
किस्मत फूट गी मेरी जो या पल्लै पड़ी ।
पूनम : तू पहल्या कोस ले अपणी किस्मत नै जी भर कै, तन्नै तो ज्युकर जीवन सफल कर दिया मेरा , तन्नै पा कै तो सारी इच्छा पूरी होगी मेरी ।
मौका मिलते ए जहर काढण लाग ज्या अपणा , कदे मिठास भी आया है इस जबान पै मेरे नाम का ??
इतणे मैं दुबारा किवाड़ खुड़कै है …..
अनिल : आऊं हूँ , आऊं हूँ , शांति राख ।
“नारंगी पीला सूट पहरे एक सुथरा सा चेहरा, जमीन मैं नजर ग़ाड्डे खड़ा था ।
ज्युकर कुछ छिन ग्या हो उसका”
अनिल : जी बोलो ,
पिछाणे नी आप !!
“उसकी आंख ईब भी जमीन पै थी, ज्युकर कुछ
उकेरणा चाहती हो, उस संगमरमर के धोले फर्श पै ।”
ब्होत हिम्मत जुटा कै वा उप्पर लखाई ।
अनिल : सुमन तू !!
“इस बोल के पाछै जो सन्नाटा ब्यखरा , उसकी चीख मैं , वे सारे ‘घा’ जो भर कै , नई खाल मैं ढल गे थे, एक बार फेर हरे हो गे ।”
” वो घर का गेट एक सीमा रेखा मैं बदलग्या ।”
“एक पासै रिवाजां की रस्सी तै गांठ मार कै गला घोंटी होई गृहस्थी थी और दूसरे पासै बख्त अर झूठे अहंकार की मार खाया होया प्यार।”
“बसी होई गृहस्थी मैं अलगाव का विलाप था अर उजड़े होए , दीमक के खाए होए प्यार मैं सुकून।”
“करुणा तै एक जीसी थी दोनूं पासै , बस बख्त सही ना था।”
“दिल के स्वार्थ नै गृहस्थी के किवाड़ लात मार कै बंद कर दिए थे ।”
अहमद फ़राज़ साहब की ग़ज़ल का यो शेर ब्होत सही लागै है आडै :
” रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ …
तू फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ “

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एक मांगण आले नै घर के दरवाजे पै रुक्का दिआ … अरै भुक्खा हूं भाई कुछ खाण नै दे द्यो …
मैं दरवाजे पै जाकै बोल्या … भाई घर कोए ना है एकला हूं कुछ बणा ना राख्या ,
सुसरा आगे तै बोल्या फेर तो बोतल खोल रया होगा एक पैग ए लवा दे

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ग्राहक: थारी भैंस की एक आंख तो खराब सै, फेर भी तू इसके 25 हज़ार रुपये मांगन लाग्र्या सै?
आदमी: तन्नै भैंस दूध खात्तर चाहिए या नैन-मटक्का करन खात्तर..?????

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बाब्बू का वाटर हीटर … 😅😅😅

तड़की बाब्बू लट्ठ लेकै खड़या होग्या अक आज तूं ठंडे पाणी गैल नहावैगा गात मैं फुर्ती आई रै सारा दन …

मखा बाब्बू रिस्तेदार बी बुलाले अंतिम किरया करम बी करणा पड़ सकै है …

बाब्बू नै वाए लट्ठ दिया कड़ मैं घुमा कै … बस फेर के उस लट्ठ की गरमी इतनी अत्याअधिक थी यारां नै पाणी की ठंडक महसूस ए ना होई .

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मै तो इसे जाडे म्य नहाया मखा उसतै विडियो कालिंग करुंगा,
उस बैरण नै फोन काट दिया नू कह के अक मने शर्म आवे से.

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आदमी ए आदमी का काटै इब रस्ता …
बिल्ली मेरे शहर की सब ठाली बैठी सैं ,

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आज फेर तेरी याद आरी , आज फेर ठेके पै जाउंगा ,
आज फेर नीदं मैं तेरा नाम ल्युंगा …
आज फेर लुगाई के मुक्के खाउंगा … 😢😢😭
.
.
.
दारु की याद आरी गंदी सोच दारु की .

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बाब्बू छोह मैं आ रया था बोल्या … उरै नै आ रै कुत्ते …

मैं पूरे स्वैग मैं … होर भांवे कुज वी करले बाब्बू पर गाल नी कड्डणी … 😎😎😎

अरै सुणजा … एक मिंट .. हाए रै … बात तो सुण … मर ग्याआआआ … देख सोरी … सोरी सोरीईईईई सुण तो ले … 😬😢😭

जिस बंदे की गाल काड्डण पै बैन लाण की सोचूं था … उसनै जुत्ता काड्ड लिआ … 😏😏

इसे इसे गाणया पै बी बैन लाओ मोदी साब

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न्यू सोचूं था अक आज एक महान रचना लिखूंगा पेज के दोस्तां तंई …

की बोर्ड पै बैठ्या ए था , माँ की अवाज आई … रै जाइए मड़ा दानें पिसवा ल्या …

एरी माँ तेरे मड़े दानेयां के चक्कर मैं आज फेर दुनिया एक महान रचना पढ़ण तै चूकगी … 😏😏😏

हर महान रचनाकार की राह में रोड़े उसके परिवार वाले ही बिछाते हैं … सइ बात है … हुंह … एकबै फेर हुंह …

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सास :- या बर्तन किसनै तोड़े …

बहु :- सोरी मांजी म्हारा झगड़ा हो ग्या था …

सास :- अर या डबल बैड … ???

बहु ( शरमांदे होए ) :- या तो समझौता करदे हाण टूट ग्या

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एक डाब्बे पै छोटू चाय लेकै आया अर आंगली चाय के गिलास मैं डुबो रया था …

गाहक छोह मैं आ गया … अरै यो के है रै …

छोटू बोल्या … जी हमरा उंगली में चोट लगा था दर्द कर रहा था इसलिए गरम चाय में डुबो दिए आराम मिलता है …

गाहक का पारा हाई हो ग्या … साले अराम तांई मेरिए चाय पाई थी … आंगली अपणे चुतड़ां मैं दे लेंदा …

छोटू भोलेपण तै बोल्या … जी बाऊ जी वंही दिए थे पर आपका चाए लाणे के लिए निकालना पड़ा

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Q :- हरियाणा मैं सब तै जादा बर्फ कित पड़े करै ?
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.
Ans :- पैग मैं

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टीचर :- “आंधे की माक्खी राम हटावै” इस मुहावरे का वाक्य में प्रयोग करो ,
छात्र :- जी माणस बेसक दारू पीकै आंधा बोला हो रया हो , पर दारू का गलास आंख बंद करकै पी सकै इतिहास गवाह है दारू के गलास मैं माक्खी ना गिरती क्योंकि “आंधे की माक्खी राम हटावै” … 😝😝
टीचर :- बाहर लिक्ड़ क्लास तै कमीण अर सांझ नै मिलिए .

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