भोलेनाथ: मांगो वत्स क्या चाहिए?
भक्त : मुझे पत्नी के साथ लड़ने की शक्ति दो। हिम्मत दो। बुद्धि दो प्रभु।
भोलेनाथ: इसको एक तरफ बैठाओ शायद भांग ज्यादा पी गया है
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भोलेनाथ: मांगो वत्स क्या चाहिए?
भक्त : मुझे पत्नी के साथ लड़ने की शक्ति दो। हिम्मत दो। बुद्धि दो प्रभु।
भोलेनाथ: इसको एक तरफ बैठाओ शायद भांग ज्यादा पी गया है
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मैडम_तू_धोखा_इसा_देगी
कई_बार_तो_अपणे_आप_पै_भी
शक_होजे_है
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रुट्ठी बैठी … न्यू कवै तन्नै आज फेर पी ली … तेरी लाइफ मैं मेरी जगाह के है … पुराणी सिम बरगी … जब जी करया घाल दी , जब जी करया लिकाड़ दी … 😏
तो आ जा नैं लाइफ टाइम रिचार्ज बणकै … जिंदगी भर दूसरी सिम की सोचूं भी कोनी
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Me : भाई , प्यार हो गया मन्नै
:
Dost : भाई तू एड्रेस बोल ।
हम छोरी की जिंदगी बर्बाद नही होण दयांगे
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बाब्बू छोह मैं आ रया था बोल्या … उरै नै आ रै कुत्ते …
मैं पूरे स्वैग मैं … होर भांवे कुज वी करले बाब्बू पर गाल नी कड्डणी … 😎😎😎
अरै सुणजा … एक मिंट .. हाए रै … बात तो सुण … मर ग्याआआआ … देख सोरी … सोरी सोरीईईईई सुण तो ले … 😬😢😭
जिस बंदे की गाल काड्डण पै बैन लाण की सोचूं था … उसनै जुत्ता काड्ड लिआ … 😏😏
इसे इसे गाणया पै बी बैन लाओ मोदी साब
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कोई भी हरियाणा से बाहर का डाक्टर हरियाणा
में आकर डाक्टर की दुकान नहीं खोल सकता
क्यों? 😉😉
क्योंकि हरियाणा के मरीज की बिमारी हरियाणा के डाक्टर के अलावा कोई समझ ही नहीं सकता
जैसे :-
“भीतरले म धूमा सा उठै है”
“आख्या म त झल सी लकडै हैं”
“गात में उचाटी सी लाग री है।”
“जी कुलमुलावे है।”
“पेट मे धुकड़ धुकड़ हो री है।”
“हाथ झूठे पड़ रे स”
“हरकत हो री स”
“कालजा लकर लकर करे स”
“सिर मै चिड़िया सी बोले सै”
“कड़ मै तरेड़ सी पाटै सै”
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पूनम : कोई आवाज दे है बाहर गेट पै , देखियो ।
अनिल : कौण है ?
पूनम : मैं ना पिछाणती
अनिल : अच्छा , रुकण की कह , मैं आऊं हुँ बाहर नै ।
एक तै इस घर मैं कुछ मिलता नी बख्त पै , मेरी घड़ी कित गई इब ?
किसे काम की नहीं या लुगाई , कोय चीज ठिकाणे पै नी पाती , बेरा ना के करती रह है सारे दिन बैठ्ठी बैठ्ठी ।
किस्मत फूट गी मेरी जो या पल्लै पड़ी ।
पूनम : तू पहल्या कोस ले अपणी किस्मत नै जी भर कै, तन्नै तो ज्युकर जीवन सफल कर दिया मेरा , तन्नै पा कै तो सारी इच्छा पूरी होगी मेरी ।
मौका मिलते ए जहर काढण लाग ज्या अपणा , कदे मिठास भी आया है इस जबान पै मेरे नाम का ??
इतणे मैं दुबारा किवाड़ खुड़कै है …..
अनिल : आऊं हूँ , आऊं हूँ , शांति राख ।
“नारंगी पीला सूट पहरे एक सुथरा सा चेहरा, जमीन मैं नजर ग़ाड्डे खड़ा था ।
ज्युकर कुछ छिन ग्या हो उसका”
अनिल : जी बोलो ,
पिछाणे नी आप !!
“उसकी आंख ईब भी जमीन पै थी, ज्युकर कुछ
उकेरणा चाहती हो, उस संगमरमर के धोले फर्श पै ।”
ब्होत हिम्मत जुटा कै वा उप्पर लखाई ।
अनिल : सुमन तू !!
“इस बोल के पाछै जो सन्नाटा ब्यखरा , उसकी चीख मैं , वे सारे ‘घा’ जो भर कै , नई खाल मैं ढल गे थे, एक बार फेर हरे हो गे ।”
” वो घर का गेट एक सीमा रेखा मैं बदलग्या ।”
“एक पासै रिवाजां की रस्सी तै गांठ मार कै गला घोंटी होई गृहस्थी थी और दूसरे पासै बख्त अर झूठे अहंकार की मार खाया होया प्यार।”
“बसी होई गृहस्थी मैं अलगाव का विलाप था अर उजड़े होए , दीमक के खाए होए प्यार मैं सुकून।”
“करुणा तै एक जीसी थी दोनूं पासै , बस बख्त सही ना था।”
“दिल के स्वार्थ नै गृहस्थी के किवाड़ लात मार कै बंद कर दिए थे ।”
अहमद फ़राज़ साहब की ग़ज़ल का यो शेर ब्होत सही लागै है आडै :
” रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ …
तू फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ “
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भगतो आज का ज्ञान … भुगतो ..
छोरियां की आधी जवानी ऐक्चुअली , लिटरली , सिरियसली करते लिकड़ जाहै
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अर छोरेयां की मेरली , तेरली करते .
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बस मैं बैठ्या था घणी भीड़ थी एक सुथरी छोरी खड़ी देख कै ना डट्या गया बोल्या :- मैं तन्नै अपणी सीट दे दूं पर तूं सोच्चैगी मैं तन्नै सैट करण की कौशिश करुं हूं ,
बोली ना तो मैं तो ना सोच्चूं ऐसा … 😗
मखा रैहण दे फेर खड़ी रै ..
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सुबह से लेके शाम तक …
शाम से लेके रात तक …
रात से फिर सुबह तक …
सुबह से फिर रात तक
फोन पै मंडया रवै … भाई यां तो तूं कुंवारा है यां तेरी लुगाई गैल्यां ना बणदी .
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घराली बोली :- आप मन्नै चाँद ल्या कै दे सको हो …
मखा हट बावली या के बात करी … बोल कै मैं दूसरे कमरे मैं गया अर अपणा शेविंग आला सिस्सा ल्या कै उसतै पकड़ा दिया … या पकड़ …
सिस्सा हाथ मैं ले कै उसमैं देख कै उसकी आँख भर आई बोली :- आप मन्नै चाँद समझो हो …
मखा ओ गलत फहमी मेरा मतबल है अक जिस मुँह तै चाँद मांगरी है वा मुंह देख पहल्यां फेर बात कर …
भाई मुंह पै चपली मारणा या कैसा पत्नी धर्म है … अर ईब रोण बी लागरी मेरे कान्नी कड़वा कड़वा देख कै .
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जाट…… दिल्ली चला गया
रेलवे स्टेशन पै अखबार वाले से bola
एक अखबार देना…
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अखबार वाला-हिन्दी या अंग्रेजी ka
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.जाट ….. भाई कोईसा दे दे
मने तो रोटी लपेटनी है|
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न्यू सोचूं था अक आज एक महान रचना लिखूंगा पेज के दोस्तां तंई …
की बोर्ड पै बैठ्या ए था , माँ की अवाज आई … रै जाइए मड़ा दानें पिसवा ल्या …
एरी माँ तेरे मड़े दानेयां के चक्कर मैं आज फेर दुनिया एक महान रचना पढ़ण तै चूकगी … 😏😏😏
हर महान रचनाकार की राह में रोड़े उसके परिवार वाले ही बिछाते हैं … सइ बात है … हुंह … एकबै फेर हुंह …
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पति बैडरूम मैं बैठ्या था लुगाई झाड़ू मारण आगी बोल्ली थोड़ा सरकिओ …
पति ड्राईंग रूम मैं आकै बैठ ग्या झाड़ू लेकै वंहा बी पोंहचगी … थोड़ा सरकिओ …
पति आंगण मैं चल्या गया … थोड़ी हाण पाच्छै औढ़ै बी … थोड़ा सरकिओ …
पति घर तै बाहर लिक्ड़ ग्या , पांच घंटे बाद लुगाई तै फोन आया … मैं चंडिगढ़ सत्तरां सैक्टर बस अड्डे पै हूं और सरकूं के
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नाक अर होंठ के बीच की जगाह नै के कए करैं ?
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मुच्छां की पार्किंग
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इब या किसनै फैलाई…
कोहली ब्याह मै बाज्या आल्या के रपिये मार गया
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