बालकपण मैं अपणे खिलौणे तेरे घरां भूल आया करदा जो तन्नै पसंद आए करदे …
स्कूल मैं तेरा बी बस्ता तेरे घर तक ठाकै ल्याए करदा …
कालेज मैं तेरी हर प्रोजैक्ट मैं दिन रात एक कर दिया करदा …
नौकरी ना करी खेती करण लाग ग्या अक तेरे तै दूर ना जांऊ …
तन्नै तो बैरण बी ना कैह सकदा बैरण … छौड़ तो गई … पर एकबै तो कैह देंदी अक वा सब मेरा पागलपण था … अर वा प्यार ना प्यार के नाम पै गुलामी थी .

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दुनिया की सारी मजबूरी एक तरफ
अर
क्लास म मास्टर के बकवास से चुटकुले पै हासण की मजबूरी एक तरफ!!

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बोली
कसम खा तेरे जीते जी कोई मेरी सौत ना होवैगी …
मखा
सुणले जो हमनै जुदा करै वा मेरी मौत ही होवैगी
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गले लाग कै रोण लाग्गी … रोड छाप शायरी मैं तो बड्डे बड्डे इम्प्रैस कर दिए , आई बड़ी शायर … 😎

( छोह मैं आवैगी तूं जाणूं हूं … पर मैं एक कॉमेडी पेज का ऐडमिन हूं या तूं बी जाणैं है , या लास्ट आली लाइन ना लिखदा तो झकौई मन्नैं ट्रोल करण लाग जांदे … 💏

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टीचर :- अच्छा इसका अंग्रेजी में अनुवाद करो … ” रामस्वरूप बिमार था परिणाम स्वरूप मर गया ”

पप्पी :- सर पहल्यां न्यु बताओ जब बिमार रामस्वरूप था तो परिणाम स्वरूप क्युकर मर गया … 😏

टीचर :- अरै बेकूफ रामस्वरूप बिमार था फलस्वरूप मर गया … 😬

पप्पी :- एल्ले ईब तीसरा मार दिया … जो बिमार है पहल्यां उसनै मारो सर जी फेर अनुवाद करुंगा … 😎

टीचर नै चाक का डब्बा बगा कै मारया बोल्या सुसरे तूं हिंदी सीख पहल्यां

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मैथ टीचर ने एक बच्चे से सवाल पूछा :- मान लो तुम्हारी भैंस ने दूध नही दिया और तुम्हे घर आए मेहमानों को चाय पिलानी है तो क्या करोगे … ?

बच्चा बोला … जी बजार से दूध ले आंउगा …

टीचर ( मुस्कुराते हुए ) :- वैरी गुड , अच्छा मान लो घर की भैंस का दूध पड़ता है बियालिस रुपये किलो , और बजार से मिलता है साड्डे बावन रुपये किलो … तुमने दूध लिया डेढ़ पाव , और दूध वाले नें उसमें पैंसठ ग्राम पानी मिला रखा था … तो बताओ तुम्हे कुल कितना नुक्सान हुआ … ?

जवाब ना देने पर मास्टर ने उस बच्चे को धूप में मुर्गा बना दिया …

अब दूसरे छात्र से वही सवाल पूछा …

छात्र बोला जी अपणे ताऊ के घर तै दूध लिआऊंगा …

टीचर बोला :- मान लो उनके घर भी दूध नही है तो …

छात्र :- जी पड़ोस आली चाची तै दूध मांग लूंगा …

टीचर चिढ़ के :- अगर उनके घर भी ना मिला तो …

छात्र :- मास्टर जी सारे गाम मैं हांड जाउंगा दूध मांगण खातर , ना मिलया तो मेहमाना तै नींबू पाणी प्या दूंगा … पर बजार तै मोल कोनी ल्यांऊ … मन्नैं धूप मैं मुर्गा ना बणना ..

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लागै सै राहुल उर्फ पप्पू आलू तह सोना बणाण आली मशीन
आपणे मामा कै तह लेकै आवैगा, जित्या पाछै

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आजकाल के बालका की घनघोर समस्या 👇👇👇
तू चाहवै सरकारी नौकरी आला
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याड़ै private की भी आस कोनी

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जुल्मी चाचा …

पड़ोस आली भाब्भी की छोटी बेब्बे आरी है … छत्त पै चक्कर मारण लाग ग्या मैं … चाचा बोल्या रै उपर के करण जाए करै …

मखा चाच्चू टाटा स्काई सैट करण जाऊं था …

बोल्या … ड्रैसिंग सैंस सुधार ले कुरते पजामे पै टाई लाए तै टाटा स्काई सैट ना होए करदी …

Me … Crying in a कूण ..

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सिर्फ पिच्छलग्गु बनके विरोध करने वालो एक बार पद्मावत देख के तो आओ …
राजपूती आन बान शान को कैसे खूबसूरती से दिखाया है इसमें

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जोणसी न्यू कहया करती :-
“तू नी मिल्या जे मर जाऊगी”
उसे कै आज दूसरा छोरा होया है!!

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भोलेनाथ: मांगो वत्स क्या चाहिए?
भक्त : मुझे पत्नी के साथ लड़ने की शक्ति दो। हिम्मत दो। बुद्धि दो प्रभु।
भोलेनाथ: इसको एक तरफ बैठाओ शायद भांग ज्यादा पी गया है

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एक बाबा दस साल तै हिमालय पै था …
एक पत्रकार उसका इंटरव्यू लेंदा बुझण लाग्या :- महाराज आप इतनी ठंड में कैसे रह लेते हो ?

महाराज नैं जवाब दिया :- बस जी तपस्या और चाय मुझे ठंड से बचाते हैं … आप क्या पसंद करेंगे तपस्या यां चाय ?

पत्रकार बोल्या ;- जी चाय …

बाबा नैं रुक्का दिया :- ए तपस्या सुणैं है या बाऊजी खात्तर चाय बणा लिया ..

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Wife :- दो घंटे खात्तर बजार जारी हूं , आपनैं कुछ चइए …
Me :- ना इतनाए बोहत सै …
(ना गई … बराबर मैं मुंह फुला कै बैठी है

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जे थारे सारा कै नये साल की कुरकरी मिटगी हो तो
मकर संक्रांति और लोहङी के मैसेज चालू कर दैवू के ।

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पूनम : कोई आवाज दे है बाहर गेट पै , देखियो ।
अनिल : कौण है ?
पूनम : मैं ना पिछाणती
अनिल : अच्छा , रुकण की कह , मैं आऊं हुँ बाहर नै ।
एक तै इस घर मैं कुछ मिलता नी बख्त पै , मेरी घड़ी कित गई इब ?
किसे काम की नहीं या लुगाई , कोय चीज ठिकाणे पै नी पाती , बेरा ना के करती रह है सारे दिन बैठ्ठी बैठ्ठी ।
किस्मत फूट गी मेरी जो या पल्लै पड़ी ।
पूनम : तू पहल्या कोस ले अपणी किस्मत नै जी भर कै, तन्नै तो ज्युकर जीवन सफल कर दिया मेरा , तन्नै पा कै तो सारी इच्छा पूरी होगी मेरी ।
मौका मिलते ए जहर काढण लाग ज्या अपणा , कदे मिठास भी आया है इस जबान पै मेरे नाम का ??
इतणे मैं दुबारा किवाड़ खुड़कै है …..
अनिल : आऊं हूँ , आऊं हूँ , शांति राख ।
“नारंगी पीला सूट पहरे एक सुथरा सा चेहरा, जमीन मैं नजर ग़ाड्डे खड़ा था ।
ज्युकर कुछ छिन ग्या हो उसका”
अनिल : जी बोलो ,
पिछाणे नी आप !!
“उसकी आंख ईब भी जमीन पै थी, ज्युकर कुछ
उकेरणा चाहती हो, उस संगमरमर के धोले फर्श पै ।”
ब्होत हिम्मत जुटा कै वा उप्पर लखाई ।
अनिल : सुमन तू !!
“इस बोल के पाछै जो सन्नाटा ब्यखरा , उसकी चीख मैं , वे सारे ‘घा’ जो भर कै , नई खाल मैं ढल गे थे, एक बार फेर हरे हो गे ।”
” वो घर का गेट एक सीमा रेखा मैं बदलग्या ।”
“एक पासै रिवाजां की रस्सी तै गांठ मार कै गला घोंटी होई गृहस्थी थी और दूसरे पासै बख्त अर झूठे अहंकार की मार खाया होया प्यार।”
“बसी होई गृहस्थी मैं अलगाव का विलाप था अर उजड़े होए , दीमक के खाए होए प्यार मैं सुकून।”
“करुणा तै एक जीसी थी दोनूं पासै , बस बख्त सही ना था।”
“दिल के स्वार्थ नै गृहस्थी के किवाड़ लात मार कै बंद कर दिए थे ।”
अहमद फ़राज़ साहब की ग़ज़ल का यो शेर ब्होत सही लागै है आडै :
” रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ …
तू फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ “

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दिल्ली में प्रदूषण का कारण हरियाणा के जाट सं
जो हुक्के का धुमा दिल्ली कण मुंह करके छोड़े सं

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